Class 10th History Ch- 2 समाजवाद एवं साम्यवाद Subjective
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Class 10th History Ch- 2 समाजवाद एवं साम्यवाद Subjective
1. ‘रूस की क्रान्ति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया’। किन्हीं दो उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करें।
उत्तर:- रूस कान्ति का विश्वव्यापी असर पड़ा –
(i) सर्वहारा वर्ग के सम्मान में वृद्धि हुई।
(ii) रूस के समान अनेक देशों में साम्यवादी सरकारों की स्थापना हुई।
(iii) शीतयुद्ध आरम्भ हुआ।
(iv) विचारधारा के आधार पर विश्व और यूरोप दो खेमों में विभक्त हो गया
(v) एशिया और अफ्रीका में साम्यवाद का पलभहुआ तथा उपनिवेश मुक्ति आंदोलन को बल मिला।
2. कार्ल मार्क्स के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:- कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी के राइन प्रांत के ट्रिपर नगर में एक यहुट्टी परिवार में हुआ था। माक्र्स पर रूसो, माटेस्क्यू एवं हीगले की विचारधारा का गहरा प्रभाव था। मार्क्स और एंगेल्स ने मिलकर 1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो अथवा साम्यवादी घोषणा-पत्र प्रकाशित किया। मार्क्स ने पूँजीवाद की घोर भत्र्त्सना की और श्रमिकों के हक की बात उठायी। उसने ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा दिया। मार्क्स ने अपने विख्यात पुस्तक दास केपिटल का प्रकाशन 1867 में किया जिसे “समाजवादियों की बाइबिल” कहा जाता है।
3. साम्यवाद एक नयी आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी। कैसे?
उत्तर:- रूस में क्रांति के बाद नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। सामाजिक असमानता समाप्त कर दी गयी। वर्गविहीन समाज का निर्माण कर रूसी समाज का परंपरागत स्वरूप बदल दिया गया। पूँजीपति और जमींदार वर्ग का उन्मूलन कर दिया गया। समाज में एक ही वर्ग रहा, जो साम्यवादी नागरिकों का था। काम के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बना दिया गया। व्यक्तिगत संपत्ति समाप्त कर पूँजीपतियों का वर्चस्व समाप्त कर दिया गया। देश की सारी संपत्ति का
राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस प्रकार, एक वर्गविहीन और शोषणमुक्त सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि रूसी क्रांति के बाद साम्यवाद एक नई आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी।
4. सर्वहारा वर्ग से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:- सर्वहारा वर्ग समाज का वैसा वर्ग है जिसमें किसान, मजदूर एवं आम लोग शामिल होते हैं। मार्क्स के अनुसार सर्वहारा वर्ग मजदूरों तथा श्रमिकों का वर्ग था जो सुविधाविहिन वर्ग था जिसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। यह पूँजीपतियों के द्वारा शोषित तथा उपेक्षित था।
5. पूँजीवाद क्या है?
उत्तर:- पूँजीवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें उत्पादन के सभी साधनों, कारखानों तथा विपणन में पूँजीपतियों का एकाधिकार होता है। ऐसी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर उत्पादन पूँजीपति अपने निहित स्वार्थ के लिए करते हैं।
6. अक्टूबर क्रांति क्या है?
उत्तर:- मार्च की क्रांति के बाद 1917 में ही दूसरी बार क्रांति हुई। यह क्रांति 7 नवम्बर, 1917 को हुई, पर पुराने रूसी कैलेण्डर के अनुसार वह दिन 25 अक्टूबर, 1917 था। अतः यह क्रांति ‘बोल्शेविक क्रांति’ या अक्टूबर क्रांति कहलाती है। यह क्रांति मेन्शेविकों और बोल्शेविकों के बीच सत्ता के संघर्ष के लिए हुई थी। सत्ता मेन्शेविक दल के नेता करेन्सकी के हाथों में आ गई थी। करेन्सकी सरकार के विरुद्ध अलोकप्रियता के कारण असंतोष बढ़ता गया। उसी समय बोल्शेविक दल के नेता लेनिन ने करेन्सकी सरकार का तख्ता पलट दिया। शासन की बागडोर लेनिन के हाथों में आ गई और रूस का नवनिर्माण आरंभ हुआ।
7. रूसी क्रांति के दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:- रूसी क्रांति के दो महत्त्वपूर्ण कारण थे
(i) निरंकुश शासन- क्रान्ति का एक महत्त्वपूर्ण कारण जारशाही की निरंकुशता था। रूस का जार हमेशा विरोधियों को कठोर-से-कठोर दंड दिया करता था। लोगों को किसी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं
थी। जार की दमनकारी व्यवस्था के कारण निरंकुश शासन असहनीय हो गया था। रासपुटीन नामक एक भ्रष्ट पादरी शासन के कार्यों में हस्तक्षेप करता था। इस अत्याचार से प्रजा का विरोध और असंतोष बढ़ता जा रहा था।
(ii) कृषक एवं मजदूरों की दयनीय स्थिति – रूसी समाज के बहुसंख्यक किसान वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मजदूर तथा श्रमिक भी शोषण के शिकार थे। अतः किसान-मजदूर जारशाही के विरोधी बन गए।
8. क्रांति से पूर्व रूसी किसानों की स्थिति कैसी थी?
उत्तर:- रूस में जनसंख्या का बहुसंख्यक भाग किसानों का ही था परंतु उनकी स्थिति बँधुआ मजदूरों की तरह थी। वे सामंतों के अधीन थे और जमीन से बँधे हुए थे। 1861 में जार एलेक्जेंडर द्वितीय ने कृषि दासता को समाप्त कर दिया था, परंतु इससे किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। उनके खेत बहुत छोटे-छोटे थे जिन पर वे परम्परागत ढंग से खेती करते थे। उनके पास पूँजी का भी अभाव था तथा करों के बोझ से वे दबे हुए थे। ऐसे में किसानों की स्थिति काफी दयनीय हो चुकी थी और किसान 1917 की क्रांति के मजबूत स्तंभ बन गए।
9. खूनी रविवार क्या है?
उत्तर:- रूस में जार के शासन से लोग तंग आ गए थे। उसका अत्याचार अत्यन्त बढ़ गया था। इसलिए 22 जनवरी (पुराने कैलेण्डर में 9 जनवरी 1905) को मजदूर अपने परिवारों के साथ एक शांतिपूर्ण जुलूस में जार से मिलने और उसे एक प्रार्थनापत्र देने के लिए पीटर्सवर्ग स्थित महल की ओर जा रहे थे। उसी समय सैनिकों ने उनपर गोलियाँ बरसा दीं। फलतः एक हजार से अधिक मजदूर मारे गए तथा कई हजार घायल हुए। चूँकि यह घटना रविवार के दिन हुई थी, इसलिए इस दिन को ‘खूनी रविवार’ कहा जाता है।
10. मार्च क्रांति के बाद केरेंसकी के नेतृत्व में बनी सरकार का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:- मार्च क्रांति के बाद रूस में केरेंसकी के नेतृत्व में एक उदार समाजवादियों की सरकार का गठन हुआ। इस सरकार का मुख्य उद्देश्य जनतांत्रिक एवं वैधानिक सरकार की स्थापना करना, मित्रराष्ट्रों के सहयोग से युद्ध चलाना, व्यक्तिगत संपत्ति की रक्षा करना, संविधान सभा द्वारा भूमि की समस्या सुलझाना एवं रूस की समस्त संस्थाओं में वैधानिक उपायों द्वारा परिवर्तन लाना था।
11. लेनिन द्वारा नई आर्थिक नीति की घोषणा क्यों की गई?
उत्तर:- लेनिन एक स्वप्नदर्शी विचारक नहीं बल्कि वह एक कुशल सामाजिक चिंतक तथा व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था। सत्ता में आने के बाद उसने आर्थिक क्षेत्र में साम्यवादी व्यवस्था को लागू किया जिसका रूस ने काफी विरोध किया। उसने यह स्पष्ट देखा कि तत्काल पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था लागू करना या एक साथ सारी पूँजीवादी दुनिया से टकराना संभव नहीं है। इसलिए उसने 1921 ई० में एक नई आर्थिक नीति की घोषणा की जिसमें मार्क्सवादी मूल्यों से कुछ हद तक समझौता करना पड़ा।
12. बोल्शेविक क्रांति के दो तात्कालिक कारण बताइए।
उत्तर:- 1917 ई० की रूसी क्रांति या बोल्शेविक क्रांति के दो कारण निम्नलिखित थे-
(i) जार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन
(ii) प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की पराजय – प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की लगातार हार होती गई। इस स्थिति में रूसी जनता और अधिक क्षुब्ध और कुध हो गई। वे पूरी तरह जारशाही को समाप्त करने के लिए कटिबद्ध हो गए। वस्तुतः प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की पराजय क्रांति का तात्कालिक कारण बना।
13. बौद्धिक जागरण ने रूसी क्रांति को किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर:- 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रूस में बौद्धिक जागरण हुआ, जिसने लोगों को निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध बगावत करने की प्रेरणा दी। अनेक विख्यात लेखकों और बुद्धिजीवियों- लियो टॉलस्टाय, ईवान तुर्गनेव, फ्योदोर दोस्तोवस्की, मैक्सिम गोर्की ने अपनी रचनाओं द्वारा सामाजिक अन्याय एवं भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का विरोध कर एक नए प्रगतिशील समाज के निर्माण का आह्वान किया। रूसी लोग विशेषतः किसान और मजदूर कार्ल मार्क्स के दर्शन से गहरे रूप से प्रभावित हुए। वे शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने को तत्पर हो गए।
14. शीत युद्ध के विषय में संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:- शीतयुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध न होकर वाकद्वन्द्र द्वारा एक-दूसरे राष्ट्र को नीचा दिखाने का वातावरण है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पूँजीवादी राष्ट्रों और रूस के बीच इसी प्रकार का शीतयुद्ध चलता रहा।
15. साम्यवाद क्या है?
उत्तर:- मार्क्स ने अपनी विख्यात पुस्तक दास कैपिटल का प्रकाशन किया। इसे साम्यवा. दियों का बाइबिल कहा जाता है। इस पुस्तक में मार्क्स के मूलभूत सिद्धांतों जैसे वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, मूल्य का सिद्धांत, पूँजीवादी और जमींदार वर्ग का उन्मूलन, काम के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बनाना इत्यादि को प्रस्तुत करती है। मार्क्सवादी दर्शन ही साम्यवाद के नाम से जाना जाता है।
16. ऐतिहासिक भौतिकवाद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:- ऐतिहासिक भौतिकवाद की व्याख्या कार्ल मार्क्स के द्वारा की गई है। इतिहास उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण के लिए दो वर्गों के बीच चल रहे निरंतर संघर्ष की कहानी है। इतिहास की प्रत्येक घटना एवं परिवर्तन के मूल रूप में आर्थिक शक्तियाँ हैं। उत्पादन प्रणाली के प्रत्येक परिवर्तन के साथ सामाजिक संगठन में भी परिवर्तन हुआ।
17. वियना संधि द्वारा लाए गए मुख्य परिवर्तन क्या थे?
उत्तर:- वियना कांग्रेस का उद्देश्य नेपोलियन द्वारा यूरोप की राजनीति में लाए गए परिवर्तनों को समाप्त करना, गणतंत्र एवं प्रजातंत्र की भावना का विरोध करना एवं पुरातन व्यवस्था की पुनर्स्थापना करना था। इसके द्वारा निम्नलिखित परिवर्तन किए गए-
(i) फ्रांस को नेपोलियन द्वारा विजित क्षेत्रों को वापस लौटाने को कहा गया।
(ii) प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमा पर नए महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दिए गए।
(iii) इटली को अनेको छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त कर दिया गया।
(iv) रूस को पोलैंड का एक भाग दिया गया।
- दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)
1. यूटोपियन समाजवादियों के विचारों का वर्णन करें।
उत्तर:- (यूटोपियन) समाजवादी आदर्शवादी थे, उनके कार्यक्रम की प्रवृत्ति अव्यावहारिक थीं। इन्हें “स्वप्नदर्शी समाजवादी” कहा गया क्योंकि उनके लिए समाजवाद एक सिद्धांत मात्र था। अधिकतर यूटोपियन विचारक फ्रांसीसी थे जो क्रांति के बदले शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास रखते थे अर्थात् वे वर्ग संघर्ष के बदले वर्ग समन्वय के हिमायती थे।
प्रथम यूटोपियन (स्वप्नदर्शी) समाजवादी जिसने समाजवादी विचारधारा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया वह फ्रांसीसी विचारक सेंट साइमन था। उसका मानना था कि राज्य और समाज का पुनर्गठन इस प्रकार होना चाहिए जिससे शोषण की प्रक्रिया समाप्त हो तथा समाज के गरीब तबकों की स्थिति में सुधार लाया जा सके। उसने घोषित किया ‘प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार’।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण यूटोपियन विचारक चार्ल्स फूरिए था। वह आधुनिक औद्योगिकवाद का विरोधी था तथा उसका मानना था कि श्रमिकों को छोटे नगर अथवा कसबों में काम करना चाहिए। इससे पूँजीपति उनका शोषण नहीं कर पाएँगे। फ्रांसीसी यूटोपियन चिंतकों में एकमात्र व्यक्ति जिसने राजनीति में भी हिस्सा लिया लुई ब्लॉ था। उसका मानना था कि आर्थिक सुधारों को प्रभावकारी बनाने के लिए पहले राजनीतिक सुधार आवश्यक है।
यद्यपि आरंभिक समाजवादी अपने आदशों में सफल नहीं हो सके, लेकिन इन लोगों ने ही पहली बार पूँजी और श्रम के बीच संबंध निर्धारित करने का प्रयास किया।
2. लेनिन के जीवन एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:- रूसी इतिहास में लेनिन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह बोल्शेविक क्रांति का प्रणेता था। उसका जन्म 10 अप्रैल, 1870 को वोल्गा नदी के किनारे स्थित सिमब्रस्क नामक गाँव में हुआ था। वह आरम्भ से ही विद्रोही था। लेनिन जारशाही का कट्टर दुश्मन था। वह बोल्शेविक दल का सदस्य बन गया। लेनिन ने 1905 की रूसी क्रांति में भाग लिया। क्रांति असफल हो गई और उसे रूस छोड़कर जाना पड़ा। 1917 की क्रांति के समय जर्मनी की सहायता से वह रूस पहुँचा। उसने रूस पहुँचकर बोल्शेविक दल का कार्यक्रम स्पष्ट किया। लेनिन ने तीन नारे दिए भूमि, शांति और रोटी। भूमि किसानों को, शांति सेना को और रोटी मजदूरों को। ट्राटस्की के सहयोग से उसने करेन्सकी की सरकार का तख्ता पलट दिया। लेनिन नई बोल्शेविक सरकार का अध्यक्ष बन गया। उसका उद्देश्य रूस का नवनिर्माण करना था।
लेनिन की उपलब्धियाँ- सर्वप्रथम लेनिन ने जर्मनी के साथ युद्ध बंद कर दिया। 1918 में जर्मनी के साथ ब्रेस्टलिटोवस्क की संधि की। उसने राष्ट्रीयता का सिद्धांत अपनाया तथा साम्राज्यवाद विरोधी नीति अपनाई। ‘चेका’ और ‘लाल सेना’ की सहायता से क्रांतिकारियों का दमन किया। बोल्शेविक सरकार ने नई आर्थिक नीति लागू की जिसके तहत देश की सारी सम्पत्ति तथा उत्पादन और वितरण के समस्त साधनों पर सरकार का आधिपत्य होगया। स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिए। धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाई। निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की। लेनिन ने प्रशासनिक सुधार कर पुराने नौकरसाह को हटा दिया। आर्थिक सुधारों के लिए 1921 ई० में नयी आर्थिक नीति अपनाई। इस प्रकार उन्होंने रूस का नवनिर्माण किया। 1924 में उनकी मृत्यु हो गई।
3. रूसी क्रांति के प्रभाव की विवेचना करें।
उत्तर:- 1917 की दूरगामी और व्यापक प्रभाव पड़े। इसका प्रभाव न सिर्फ रूस पर बल्कि विश्व के अन्य देशों पर भी पड़ा। इस क्रांति के रूस पर निम्नलिखित प्रभाव हुए-
(i) स्वेच्छाचारी जारशाही का अंत-1917 की बोल्शेविक क्रांति के परिणामस्वरूप अत्याचारी एवं निरंकुश राजतंत्र की समाप्ति हो गई। रोमनोव वंश के शासन की समाप्ति हुई तथा रूस में जनतंत्र की स्थापना की गई।
(ii) सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना- बोल्शेविक क्रांति ने पहली बार शोषित सर्वहारा वर्ग को सत्ता और अधिकार प्रदान किया। नई व्यवस्था के अनुसार भूमि का स्वामित्व किसानों को दिया गया। उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व समाप्त कर दिया गया। मजदूरों को मतदान का अधिकार दिया गया।
(iii) नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना – क्रांति के बाद रूस में एक नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई। यह व्यवस्था साम्यवादी विचारधारा के अनुकूल थी। प्रशासन का उद्देश्य कृषकों एवं मजदूरों के हितों की सुरक्षा करना एवं उनकी प्रगति के लिए कार्य करना था। रूस में पहली बार साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई।
(iv) नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था – क्रांति के बाद रूस में नई सामाजिक आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। सामाजिक असमानता समाप्त कर दी गई। वर्गविहीन समाज का निर्माण कर रूसी समाज का परंपरागत स्वरूप बदल दिया गया। क्रांति का विश्व पर प्रभाव – रूसी क्रांति का विश्व के दूसरे देशों पर भी प्रभाव पड़ा। ये प्रभाव निम्नलिखित थे-
(i) पूँजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक सुधार के प्रयास – विश्व के जिन देशों में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था थी। वे भी अब यह महसूस करने लगे कि बिना सामाजिक आर्थिक समानता के राजनीतिक समानता अपर्याप्त है।
(ii) साम्यवादी सरकारों की स्थापना – रूस के समान विश्व के अन्य देशों चीन, वियतनाम इत्यादि में भी बाद में साम्यवादी सरकारों की स्थापना हुई। साम्यवादी विचारधारा के प्रसार और प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रसंघ ने भी मजदूरों की दशा में सुधार लाने के प्रयास किए। इस उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ की स्थापना की गई।
(iii) साप्म्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया तीव्र – बोल्शेविक क्रांति ने साम्राज्यवाद के पतन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। रूस ने सभी राष्ट्रों में विदेशी शासन के विरुद्ध चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन को अपना समर्थन दिया। एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशों से स्वतंत्रता के लिए प्रयास तेज कर दिए गए।
(iv) नया शक्ति संतुलन – रूस के नवनिर्माण के बाद रूस साम्यवादी सरकारों का अगुआ बन गया। दूसरी ओर अमेरिका पूँजीवादी राष्ट्रों का नेता बन गया। इससे विश्व दो शक्ति खंडों में विभक्त हो गया। इसने आगे चलकर दोनों खेमों में सशस्त्रीकरण की होड़ एवं शीतयुद्ध को जन्म दिया।
