Class 10th History Ch- 1 यूरोप में राष्ट्रवाद Subjective
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Class 10th History Ch- 1 यूरोप में राष्ट्रवाद Subjective
1. इटली के एकीकरण में मेजिनी का क्या योगदान था?
उत्तर:- मेजिनी को इटली के एकीकरण का ‘पैगम्बर’ या ‘मसीहा’ कहा जाता है। राष्ट्रवादी भावना से प्रेरित होकर उसने कार्वोनारी की सदस्यता ग्रहण की। वह गणतांत्रिक विचारों का समर्थक तथा साहित्यकार था। उसके लेखों से इटली के लोगों में उत्साह और राष्ट्रीयता की भावना विकसित हुई। 1830-31 के विद्रोह में उसने सक्रिय भूमिका निभाई। गणतंत्रवादी उद्देश्यों का प्रचार करने के लिए उसने ‘यंग इटली’ तथा ‘यंग यूरोप’ का गठन किया। वह आस्ट्रिया के प्रभाव से इटली को मुक्त कराना चाहता था। 1848 ई० में इटली के एकीकरण का प्रयास किया किन्तु वह असफल रहा और उसे पलायन करना पड़ा।
2. गैरीबाल्डी के कार्यों की चर्चा करें।
उत्तर:- इटली के एकीकरण का द्वितीय चरण गैरीबाल्डी की तलवार ने पूरा किया। वह युद्ध की नीति में विश्वास करता था। उसने सशस्त्र युवकों की एक टुकड़ी बनाई जो ‘लाल कुर्ती’ कहलाए। इनकी सहायता से उसने सिसली पर अधिकार कर वहाँ गणतंत्र की स्थापना की। वह पोप के राज्य पर भी आक्रमण करना चाहता था, परंतु काबूर ने इसकी अनुमति नहीं दी।
3. जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने कौन-सी नीति अपनायी?
उत्तर:- प्रशा के राजा विलियम प्रथम ने प्रख्यात राष्ट्रवादी और कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क को अपना प्रधानमंत्री (चांसलर) नियुक्त किया। जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने ‘रक्त और तलवार’ की नीति अपनायी। सबसे पहले बिस्मार्क ने आर्थिक सुधारों के द्वारा प्रशा की स्थिति मजबूत की। इससे सैनिक शक्ति सुदृढ़ हुई। प्रशा के एकीकरण के लिए उसने डेनमार्क, अॅस्ट्रिया तथा फ्रांस के साथ युद्ध किया।
इसके परिणामस्वरूप ही यूरोप के नक्शे पर एकीकृत जर्मन राष्ट्र का उदय हुआ।
4. मेजिनी कौन था?
उत्तर:- मेजिनी को इटली के एकीकरण का पैगम्बर या मसीहा कहा जाता है। वह सेनापति होने के साथ-साथ जनतांत्रिक विचारों का समर्थक तथा साहित्यकार भी था। उसने गणतंत्रवादी उद्देश्यों के प्रचार के लिए 1831 में ‘यंग इटली’ की स्थापना की। मेजिनी का उद्देश्य ऑस्ट्रिया के प्रभाव से इटली को मुक्त करवाना तथा सम्पूर्ण इटली का एकीकरण करना था।
5. इटली तथा जर्मनी के एकीकरण में ऑस्ट्रिया की भूमिका क्या थी?
उत्तर:- ऑस्ट्रिया, इटली और जर्मनी के एकीकरण का विरोधी था। इटली में वेनेशिया और लोम्बार्डी पर ऑस्ट्रिया का अधिकार था। सेडोवा के युद्ध (1866) में ऑस्ट्रिया के पराजय के बाद उसका प्रभाव इटली पर से समाप्त हो गया।
जर्मनी ऑस्ट्रिया के अधीन शक्तिहीन संघ राज्य था। उत्तरी जर्मन महासंघ की स्थापना के बाद जर्मनी से ऑस्ट्रिया का प्रभाव समाप्त हो गया।
6. वियना काँग्रेस की दो उपलब्धियाँ बताइए।
उत्तर:- वियना सम्मेलन की मुख्य उपलब्धियाँ थी
(i) नेपोलियन द्वारा पराजित राजवंशों की पुनर्स्थापना का प्रयास किया गया।
(ii) फ्रांस और स्पेन में बूबाँ राजवंश को फिर स्थापित किया गया। फ्रांस में लुई 18वाँ को राजगद्दी सौंपी गयी। इटली में ऑस्ट्रियाई राज परिवार को सत्ता सौंपी गयी। नेपोलियन द्वारा स्थापित 39 राज्यों के जर्मन महासंघ को भंग नहीं किया गया। इस प्रकार वियना व्यवस्था द्वारा यूरोप में राजनीतिक परिवर्तन कर पुरानी सत्ता को बहाल किया गया।
7. जर्मनी के एकीकरण की बाधाएँ क्या थी?
उत्तर:- जर्मनी के एकीकरण में निम्नलिखित प्रमुख बाधाएँ थीं-
(i) लगभग 300 छोटे-बड़े राज्य
(ii) इन राज्यों में व्याप्त राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक विषमताएँ
(iii) राष्ट्रवाद की भावना का अभाव
(iv) ऑस्ट्रिया का हस्तक्षेप तथा
(v) मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति।
8. ‘स्वर्णिम मध्यमवर्गीय’ नीति का अवलम्बन किसने और क्यों किया?
उत्तर:- ‘स्वर्णिम मध्यमवर्गीय नीति’ का अवलम्बन लुई फिलिप ने किया। इसने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए सन् 1840 में गीजों को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो कट्टर प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी तरह के वैधानिक, सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के विरुद्ध था।
9. वियना कांग्रेस का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:- वियना कांग्रेस का उद्देश्य नेपोलियन द्वारा यूरोप की राजनीति में लाए गए परिवर्तनों को समाप्त करना, गणतंत्र एवं प्रजातंत्र की भावना का विरोध करना एवं पुरातन व्यवस्था की पुनर्स्थापना करना था।
10. जोलवेरिन का गठन क्यों हुआ?
उत्तर:- 1834 में जर्मन व्यापारियों ने आर्थिक व्यापारिक समानता के लिए प्रशा के नेतृत्व में जोलवेरिन नाम आर्थिक संघ बनाया। उस संघ ने जर्मन क्षेत्रीय आदतों को कुचलकर राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया।
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)
1. यूनानी स्वतंत्रता आंदोलन का संक्षिप्त विवरण दें।
उत्तर:- 18वीं सदी में ऑटोमन साम्राज्य की स्थिति दुर्बल होने लगी। उसे ‘यूरोप का मरीज’ कहा जाने लगा। इससे लाभ उठाकर राष्ट्रवादी शक्तियाँ सशक्त हो गई। इन्हें यूनान के बौद्धिक आंदोलन तथा गुप्त क्रांतिकारी संगठनों का साथ मिला। परिणामस्वरूप, 1821 में सोलडेविया में व्यापक विद्रोह हुआ जिसे कुचल दिया गया। मोरिया में दूसरा विद्रोह शुरू हुआ। तुर्की के सुल्तान ने इस विद्रोह को धार्मिक स्वरूप देने का प्रयास किया। मिस्र के शासक पाशा रहमत अली की सहायता से उसने क्रूरतापूर्वक विद्रोह का दमन किया। इससे पूरा यूरोप स्तब्ध हो गया। तुर्की के विरुद्ध ब्रिटेन, रूस और फ्रांस संयुक्त कार्रवाई के लिए तैयार हुए। रूस द्वारा पराजित होकर 1829 में तुर्की ने उसके साथ एड्रियानोपुल की संधि की। यूनानी राष्ट्रवादियों ने इस सौंध को स्वीकार नहीं किया था। फलतः 1832 में कुस्तुनतुनिया की संधि द्वारा स्वतंत्र यूनान का उदय हुआ। बबेरिया का राजकुमार ऑटो यूनान का शासक बना।
2. राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं परिणामों की चर्चा करें।
उत्तर:- कारण – यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना को 1789 की फ्रांसीसी क्रांति तथा नेपोलियन की विजयों ने बढ़ावा दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने कुलीन वर्ग के हाथों से राजनीति को सर्वसाधारण एवं मध्यमवर्ग तक पहुँचा दिया। नेपोलियन ने विजित राज्यों में राष्ट्रवादी भावना जागृत कर दी। साथ ही नेपोलियन के युद्धों और विजयों से अनेक राष्ट्रों में फ्रांसीसी आधिपत्य के विरुद्ध आक्रोश पनपा, जिससे राष्ट्रवाद का विकास हुआ।
परिणाम- 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में यूरोप में जिस राष्ट्रवाद की लहर चली, उसके व्यापक और दूरगामी परिणाम यूरोप और विश्व पर पड़े जो निम्नलिखित थे–
(i) राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर अनेक राष्ट्रों में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए। इनके फलस्वरूप अनेक नए राष्ट्रों का उदय हुआ, जैसे इटली और जर्मनी के एकीकृत राष्ट्र।
(ii) यूरोपीय राष्ट्रवाद के विकास का प्रभाव एशिया और अफ्रीका में भी पड़ा। यूरोपीय उपनिवेशों के आधिपत्य के विरुद्ध वहाँ भी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो गए।
(iii) राष्ट्रवाद के विकास ने प्रतिक्रियावादी शक्तियों और निरंकुश शासकों का प्रभाव कमजोर कर दिया।
(iv) भारतीय राष्ट्रवाद भी यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्रभावित हुआ।
(v) राष्ट्रवादी प्रवृत्ति ने साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। इसने अंततः प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।
3. इटली के एकीकरण में मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के योगदानों को बताएँ।
उत्तर:- इटली के एकीकरण में मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। उनके योगदान क्रमशः निम्नवत् रहे-
मेजिनी- मेजिनी इटली के एकीकरण का मसीहा था। वह बचपन से ही इटली की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्नशील था। 1831 ई० में उसने ‘यंग इटली’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था ने युवकों में नई चेतना जगाई। उसने मजदूरों, विद्यार्थियों तथा युवकों में इटली की स्वतंत्रता का भाव जगाया। मेजिनी के गणतंत्रवादी विचारों ने इटली के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया।
काबूर- इटली का वास्तविक निर्माता काबूर को माना जाता है। काबूर 1858 में पीडमौंट का मंत्री प्रमुख था। उसका मुख्य उद्देश्य ऑस्ट्रिया से इटली के उद्धार को प्रभावित करना था। उसने फ्रांस के साथ एक चतुर कूटनीतिक गठबंधन कायम किया और इसके माध्यम से 1859 में ऑस्ट्रियाई सेवाओं को परास्त करने में सफलता प्राप्त की।
गैरीबाल्डी- गैरीबाल्डी ‘लाल कुर्ती’ नामक क्रांतिकारी आंदोलन का नायक था। गैरीबाल्डी को ‘तलवार’ कहा जाता था। 1860 में उसने दक्षिणी इटली तथा दो सिसलियों की राजधानी में पद यात्रा की और स्थानीय कृषकों का समर्थन प्राप्त कर स्पेन के शासकों को हटाने में सफल हुआ।
इस प्रकार इटली का एकीकरण तीन प्रमुख नायकों की वजह से 1870 में संभव हो सका। ये तीन प्रमुख नायक क्रमशः मेजिनी को ‘मसीहा’ काबूर को ‘राजनीतिज्ञ’ तथा गैरीबाल्डी को ‘तलवार’ कहा जाता था।
4. यूरोप में राष्ट्रवाद के प्रसार में नेपोलियन बोनापार्ट के योगदानों की विवेचना करें।
उत्तर:- यूरोप में राष्ट्रवाद के प्रसार में फ्रांस की राज्यक्रांति तत्पश्चात नेपोलियन के आक्रमणों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में डायरेक्टों का शासन समाप्त कर प्रथम कॉन्सल के रूप में फ्रांस में सत्ता पर अधिकार करते हुए 1804 में वह फ्रांस का सम्राट बन बैठा। सम्राट के रूप में उसने ब्रिटेन के अतिरिक्त समस्त यूरोप पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके साथ ही फ्रांसीसी क्रांति का संदेश नेपोलियन के प्रभाववाले यूरोपीय क्षेत्रों पर पड़ा। फ्रांसीसी आधिपत्यवाले राज्यों में वैसी ही संस्थाएँ स्थापित की गई जो फ्रांस में प्रचलित थी। फ्रांस पर आश्रित राज्यों में भी नेपोलियन संहिता, फ्रांसीसी शासन और अर्थव्यवस्था लागू की गई। 1804 में नेपोलियन संहिता द्वारा जन्मजात विशेषाधिकार समाप्त कर दिया गया। कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत अपनाया गया। इससे फ्रांस अधिकृत यूरोपीय देशों में एक नई आशा जगी। वहाँ भी तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठने लगी तथा राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ। यूरोप के कई राज्यों में नेपोलियन के अभियानों द्वारा नवयुग का संदेश पहुँचा।
नेपोलियन ने जर्मनी और इटली के राज्यों को भौगोलिक नाम की परिधि से बाहर कर उसे वास्तविक एवं राजनैतिक रूपरेखा प्रदान की। जिससे इटली और जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। दूसरी तरफ नेपोलियन की नीतियों के कारण फ्रांसीसी प्रभुसत्ता और आधिपत्य के विरुद्ध यूरोप में राष्ट्रवाद का प्रसार हुआ तथा देशभक्ति की भावना बलवती होने लगी।
5. 1848 ई० की फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे?
उत्तर:- 1830 की क्रांति के बाद लुई फिलिप फ्रांस का राजा बना। उसने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए ‘स्वर्णिम मध्यमवर्गीय नीति’ अवलंबन करते हुए सन् 1840 में गीजों को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो कट्टर प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी तरह के वैधानिक, सामाजिक और आर्थिक सुधारों के विरुद्ध था। फिलिप के पास कोई सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था और न ही उसे विदेश नीति में कोई सफलता हासिल हो रही थी। उसके शासनकाल में देश में भुखमरी एवं बेरोजगारी व्याप्त हो गई। सुधारवादियों ने 22 फरवरी, 1848 ई० को पेरिस में थियर्स के नेतृत्व में एक विशाल भोज का आयोजन किया। राजा ने इस पर रोक लगा दी। अतः पेरिस में विरोध प्रदर्शन हुए और जुलूस निकाले गए। इस पर पुलिस ने गोली चला दी। जिसमें अनेक लोग मारे गए। अतः दमनकारी नीति अपनाए जाने के कारण 1848 ई० की क्रांति आरंभ हो गई।
6. राष्ट्रवाद आधुनिक विश्व की राजनैतिक जागृति का प्रतिफल किस प्रकार है? विवेचना करें।
उत्तर:- 18वीं-19वीं शताब्दी में यूरोप में जिस राष्ट्रवाद की लहर चली उसके व्यापक और दूरगामी प्रभाव न केवल यूरोप पर वरन् पूरे विश्व पर पड़ा जो निम्नलिखित थे
(i) राष्ट्रीयता की भावना से ही प्रेरित होकर अनेक राष्ट्रों में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए जिसके परिणामस्वरूप अनेक नये राष्ट्रों का उदय हुआ। इटली और जर्मनी का एकीकरण भी राष्ट्रवाद के उदय का ही परिणाम था।
(ii) राष्ट्रवाद के विकास का प्रभाव एशिया और अफ्रीका में भी देखने को मिला। यूरोपीय उपनिवेशों के आधिपत्य के विरुद्ध वहाँ भी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो गए।
(iii) भारतीय राष्ट्रवादी भी यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्रभावित हुए। मैसूर के टीपू सुलतान ने फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित होकर जैकोबिन क्लब की स्थापना की एवं स्वयं इसका सदस्य भी बना।
(iv) धर्मसुधार आंदोलन के भारतीय नेताओं ने भी राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रभावित होकर राष्ट्रीय आंदोलनों को अपना समर्थन दिया।
(v) राष्ट्रवाद के विकास ने यूरोप में प्रतिक्रियावादी शक्तियों और निरंकुश शासकों के प्रभाव को कमजोर कर दिया।
